मंगलवार, 20 जनवरी 2009

आत्मा और शरीर अत्यन्त भिन्न हैं



भगवान् आत्मा केवलज्ञान की मूर्ती है और यह शरीर तो जड़ -धूल है मिट्टी है शरीर को आत्मा का स्पर्श ही कहाँ है !!
पूज्य गुरुदेव कानजी स्वामी

सोमवार, 19 जनवरी 2009

ज्ञायक ही कारण परमात्मा है



विकारीपन (विकारत्व) तो आत्मा में नहीं किंतु अल्पज्ञता भी वास्तव में आत्मा में नही ..., पहली ही चोट में सिद्धत्व की स्थापना जो करेगा उसको ही सम्यक दर्शन होता है | आत्मा तो त्रिकाली ध्रुवस्वभाव परम पारनामिक भावः ही आत्मा है . संवर निर्जरा मोक्ष पर्याय में भी आत्मा नहीं उपादेय नहीं उपादेय तो कारण परमात्मा ही है ||  
जिसको दुःख का नाश करना हो उसको प्रथम क्या करना ? पर तरफ के विकल्पों को छोड़कर , राग का प्रेम तोड़कर उपयोग(ज्ञान) को अन्दर जोड़ना ...!!!! तीन लोक के नाथ सर्वज्ञ के पास भी हित की कामना रखना यह भी भ्रम है | शुभ अशुभ भाव का प्रसंग आवे तो भी उससे भिन्न रहकर " मैं तो ज्ञाता ही हूँ " |  
पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

शनिवार, 17 जनवरी 2009

भगवान् स्वरुप



जैसे अरिहंत और सिद्ध भगवान् हैं ऐसा ही मैं हूँ , ऐसी दो की समानता शुद्ध-अस्तित्व का विश्वास के जोर है !! प्रभु मेरे तुम सब बातें ही पूरा पर की आस करे क्या प्रीतम ! तू किस बात अधूरा ...!!

सिद्ध भगवान् जानने वाले देखने वाले हैं ऐसे ही तुम भी जानने वाले देखने वाले हो ! पूरे अधूरे का प्रश्न ही कहाँ है ! अपने जानने वाले देखने वाले स्वरुप से खिसक कर जो तुम कर्तत्व में ही रुक गए हो इसलिए ही सिद्ध भगवान् से अलग हो !

पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

मैं ही परमात्मा हूँ



सब परिणमन श्रेणीबद्ध है , इसलिए तुम तो मात्र जानने वाले हो पूर्ण जाननहार इसमें विकार और अपूर्णता क्या ? ! एक रूप परिपूर्ण ही हो ! ........ परिपूर्ण परमात्मा हो !!!!!
मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर !

राग की क्रिया करने वाले क्या वो तुम हो ? अज्ञान- और राग का कर्तत्व अपने को सौपना ही अज्ञान- और मिथ्या भ्रम है ...! " सर्वोत्कृष्ट ही परमात्मा कहा जाता है और वह तो तुम स्वंय ही हो " !!! मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर !  
पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

बुधवार, 14 जनवरी 2009

भगवान् आत्मा




अनंत सिद्धों को तेरी पर्याय में स्थापित किया है , अब तेरा चार गति में रुलना नहीं रहेगा ,अब तुम अल्पज्ञ भी नहीं रह सकोगे अपने सर्वज्ञ स्वभाव से ही तुम सर्वज्ञ हो जाओगे |  


सभी जीव साधर्मी हैं विरोधी कोई नहीं सर्व जीव पूर्णानंद को प्राप्त हो ! कोई जीव अपूर्ण ना रहो कोई जीव विपरीत दृष्टिवंत ना रहो !  
पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

स्वभाव का लक्ष्य ही आदरणीय है



आत्म स्वभाव के लक्ष्य वाला जीवन ही आदरणीय है , इसके सिवाय दूसरा जीवन आदरणीय गिनने में आया नहीं | विकल्प में स्वयं का अस्तित्व मानने से और महातम्य भाव से ही मिथ्यात्व है |
पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

सोमवार, 12 जनवरी 2009

जिन स्वरूपी प्रभु हो तुम

जो जिनेन्द्र है वैसा ही मैं हूँ ऐसा मनन करो ; अरे.. रे.. रे.. मैं अल्पज्ञ हूँ मेरे में ऐसी कोई ताकत होती होगी ?? ये बात रहने दे भाई !! मैं पूर्ण परमात्मा होने लायक हूँ --- ऐसा भी नहीं किंतु मैं तो पूर्ण परमात्मा अभी ही हूँ ऐसा मनन करो !! आहा .. हां... ! पूज्य गुरुदेव कानजी स्वामी

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