गुरुवार, 15 जनवरी 2009

मैं ही परमात्मा हूँ



सब परिणमन श्रेणीबद्ध है , इसलिए तुम तो मात्र जानने वाले हो पूर्ण जाननहार इसमें विकार और अपूर्णता क्या ? ! एक रूप परिपूर्ण ही हो ! ........ परिपूर्ण परमात्मा हो !!!!!
मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर !

राग की क्रिया करने वाले क्या वो तुम हो ? अज्ञान- और राग का कर्तत्व अपने को सौपना ही अज्ञान- और मिथ्या भ्रम है ...! " सर्वोत्कृष्ट ही परमात्मा कहा जाता है और वह तो तुम स्वंय ही हो " !!! मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर !  
पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी

9 टिप्‍पणियां:

seema gupta ने कहा…

" सर्वोत्कृष्ट ही परमात्मा कहा जाता है और वह तो तुम स्वंय ही हो " !!! मैं ही परमात्मा हूँ ऐसा स्वीकार कर !

"सत्य वचन आभार"

Regards

विवेक सिंह ने कहा…

ज्ञानी लोग ठीक ही कहते होंगे ! आभार !

Amit ने कहा…

bahut shai kaha aapne...

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर कहा ।

हिमांशु ने कहा…

कुन्द के पुष्प जैसी धवल और सुगन्धित है आपकी यह प्रविष्टि. धन्यवाद.

राज भाटिय़ा ने कहा…

सत्य वचन..
आत्मा ही परमात्मा है
आत्मा हम सब मै है, लेकिन ....
धन्यवाद

रंजना ने कहा…

बहुत सुंदर, सत्य वचन ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

सत्य वचन जी

materials ने कहा…

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